आम आदमी को दोषारोपित करते सरकार और लोग

फीकी पड़ी परशुराम जयंती और ईद


                   शायद जानवरों और मनुष्य में संवेदना ही ऐसी चीज थी जो हमें उनसे अलग करती थी। हम परिवारवाद ,समाजवाद और समूह में विश्वास करते थे हम एक दूसरे के सुख और दुख में खड़े रहने पर विश्वास करते थे। मनुष्य संवेदना से भरा हुआ था रिश्तो से बंधा हुआ था और लोकतंत्र में विश्वास करता था।
               और इन्हीं संवेदनाओं के कारण हमने एक सिस्टम बनाया उस सिस्टम को चलाने की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों को वोट देकर सौप दी।
        पर कोरोना महामारी ने हमें ऐसे दिन दिखाए की आज हम उन्हीं मानवीय संवेदनाओं को खोते जा रहे हैं। संवेदनाओं की ही कमी है और खुद की स्वार्थ सिद्धि की  यदि इस महामारी की चपेट में कोई परिवार, कोई सदस्य, कोई मोहल्ले का व्यक्ति आता है तो हम उसे दूसरे ग्रह से आए प्राणी कि तरह देखते हैं। उस घर के आस पास जाना भी पसंद नहीं करते, इसी क्रम में हमने देखा कि कई घरों में लाश उठाने वाला कोई नहीं था फिर भी पड़ोसियों ने कंधा देने की जहमत नहीं उठाई और कई दिनों तक लाशें घरों में पड़ी रही ना पड़ोसी आए और ना ही सरकारी एंबुलेंस।
       लेकिन मेरा मानना है इन सब का कारण कोई इंडिविजुअल मनुष्य नहीं बल्कि हमारी सरकारें हैं कहीं ना कहीं करोना महामारी के नाम पर इतना भय व्याप्त करा दिया गया है कि यदि आप इस गंभीर बीमारी के चपेट में आते हैं तो घंटों फोन करने के बाद आपको एंबुलेंस नहीं मिलेगी,  किसी अस्पताल में भर्ती होने के लिए बैड नहीं मिलेगा, चलिए यदि कुछ जुगाड़ रखते हैं तो बेड भी मुहैया हो गया, इसके बाद अंदर आपके परिवार वालों को तीमारदार की तरह जाने की इजाजत नहीं मिलेगी... वहां उपस्थित मेडिकल स्टाफ जो भी इलाज करें जैसा भी व्यवहार करें यह सब बातें उस मरीज और स्टाफ के दरमियान ही रह गई और यदि इसी जद्दोजहद में आप महामारी को हराने में सफल हुए और घर वापस आ गए तो भी घर वाले शंका की दृष्टि से ही  देखेंगे और अपने ही रिश्तेदार को अपनाने में समय लगेगा।           
                    यदि वापस नहीं आ पाए तो शायद इस पूरी जटिलता और भयावहता को देखते हुए कोई भी यह नहीं चाहेगा कि वह इस महामारी की चपेट में आए और खुद की जान बचाने और खुद की जीवन की रक्षा के लिए शायद ऐसे ही लोग लाशें तक लेने नहीं जा रहे, हजारों लावारिस लाशें अस्पताल प्रशासन को रखनी और डिस्पोज करनी पड़ रही है।
     चलिए यह तो एक खराब व्यवस्था की बात है ,हमारे मन के डर की बात है, खुद को सुरक्षित रखने की बात है पर पंचायत चुनाव कराकर और बंगाल में पूरे देश के कई प्रदेश लगाकर सरकार को ऐसे कौन से संरक्षित निधि मिल गई यह पता नहीं चल पाया हां करो ना की महामारी की तीव्रता जरूर बढ़ गई।
         प्रधानी के चुनाव में अच्छे प्रधान मिले कि नहीं मिले इसका तो पता नहीं पर चुनाव की बदौलत  आज हजारों गांव वाले, हजारों कर्मचारी और हजारों शिक्षक कालकल्वित हो गए या आज भी मौत के मुहाने पर खड़े कोरोना महामारी की जंग से जूझ रहे है,इसका कारण भी क्या व्यक्ति को देखें????
       यह जिम्मेदारी सरकारों की थी कि वह महामारी में अपने देश अपने राज्य की रक्षा करें उन्हें मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराएं आज किसी पेपर में मैंने देखा राज्य सरकार के मुखिया का बयान छपा था जिसमें उन्होंने कहा कि यदि शिक्षकों ने कोरोना का टीका लगवाया होता तो इतनी तादाद में शिक्षक मौत के मुंह में ना गए होते। अब इन साहब को कौन समझाए कि टीका लगवाने का काम आम आदमी का नहीं सरकारों का था।
      वाकई बयान हास्यास्पद था और फिर  त्रासदी में ढकेल ने कि सरकार की मंशा का एक नमूना यदि वाकई आपके पास इतनी टीके थे तो आपने हर विभाग के कर्मचारियों को क्यों नहीं लगवा दिए , विभिन्न कर्मचारी संगठन लगातार मांग करते रहे की चुनाव ड्यूटी में भेजने से पहले टीकाकरण किया जाए पर मजाल है कि सरकार के कान में जूं भी रेग जाएं।विभाग में गिनती के कर्मचारी होते हैं और एक कैंप लगा होता तो सभी को टीके लग गए होते पर क्या करें बातें तो बहुत है पर हकीकत में सब कुछ खोखला है,और अब मर जाने के बाद उसकी जिम्मेदारी भी शिक्षकों पर थोप दी गई। 
            अन्य शहरों का तो मुझे नहीं पता पर लखनऊ के हालात यह हैं कि जिन्होंने एक डोज लगवा दी है उन्हें दूसरी डोज लगवाने के लिए टीके की अनुपलब्धता बताई जा रही है। जब चुनाव के समय यह राजनेता घर-घर जाकर हाथ जोड़कर पंपलेट पहुंचा सकते हैं तो सर समय टीके क्यों नहीं उपलब्ध करा पा रहे।
     अब आइए मरने के बाद की व्यवस्था की चर्चा हो जाए ,शहरों में श्मशान घाट सीमित है पर वहां लगने वाली लाइन असीमित....... मैंने खुद निशातगंज डायट पुल के नीचे तक एंबुलेंस की लंबी लाइनें देखी हैं। जोकि अपने अनवरत क्रम को ना तोड़ने पर आमादा थी यह जानबूझकर मृतक के परिवार वाले नहीं कर रहे थे, जलाने की सुविधा का अभाव और एक साथ सैकड़ों मृत शरीर जलने के बावजूद व्यवस्था और कालाबाजारी के चलते समय से जगह ना मिलने की कमी थी पर यह वही समझ सकेगा जिसने अपने परिवारों की पार्थिव शरीर को शमशान तक ले जाने की जहमत उठाई।
           निश्चित रूप से अब आप यह तो नहीं कहेंगे कि लोग जान उसके मर रहे हैं उन्हें अभी नहीं मरना चाहिए था अब इतनी असंख्यकी मौत की जिम्मेदार सरकार क्यों वह लोग ही हैं जो महामारी को नहीं  झेल पाए। बीमार होने के बाद हफ्तों जांच की रिपोर्ट नहीं आती, कहीं सरकारी आंकड़े ज्यादा ना हो जाए बहुत सी रिपोर्ट में तो कभी नहीं आई, कभी-कभी तो व्यक्ति इंतजार में अपना सब कुछ खो भी देता है.
            इस जद्दोजहद का दर्द ही सरकार नहीं वह परिवार ही जानते हैं जिनके घर में शायद बच्चे महिलाएं ही बचे, जहां लाशों को कंधा देने वाला कोई, जिन परिवारों में नई नवेली दुल्हन और दूध मुंह बच्चे बचे ,कैसे उनके खोए हुए अपनों का अंतिम संस्कार हुआ होगा क्या हुआ होगा.... भगवान ही मालिक है।
          वाकई  सच है कि जो हमारी सरकार, हमारे जनप्रतिनिधि संवेदनशीलता को खो देते हैं, हमने कदम कदम पर जनप्रतिनिधि चुनकर अरबों रुपए चुनाव पर भूखे हैं आपके मोहल्ले के सभासद से लेकर संसद और केंद्र और सत्ता के मालिक चुनाव के समय आपके घर तक पहुंच जाते हैं पर इस महामारी में क्या कोई भी आपके दरवाजे तक दिखा ?.........तो फिर आप उस अबोध जनता से संवेदना की आशा कैसे कर सकते हैं जिसमें हिंदुत्व के नाम पर सरकार तो बना दी पर वही हिंदू ना तो जलाने के लिए लकड़ी पा रहे हैं और ना ही गज भर जगह जहां उनकी पार्थिव शरीर को रखा जा सके । श्मशान घाट में चार्ज लग रहा है ₹30000 दीजिए और श्मशान घाट के अंदर की सुविधाएं प्राप्त करें। इस कालाबाजारी में आप किसे दोष देंगे.....??? निश्चित रूप से उस इंसान को जो 24 घंटे लाशों को जलाने के लिए खड़ा है उन कर्मचारियों को जो 24 घंटे लाशों की गिनती में लगे हुए हैं या उन सरकारों को जिन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में ना तो कहीं एक भी कर्मचारी की भर्ती की और ना ही प्राइवेट एनजीओ को इन कार्यों में लगा सके।
           क्या किन्ही स्वयंसेवकों की टीम इस महामारी में आई कि हम मानवता की सेवा करना चाहते हैं निश्चित रूप से नहीं.....
         शासन सत्ता जिसके पास होती है समालोचना निंदा और आलोचना भी उसी की होती है क्योंकि सुविधाओं को बनाने, बनी हुई सुविधाओं को आगे बढ़ाने और नई सुविधाओं को मुहैया कराने का कार्य केंद्र और राज्य सरकारों का होता है , विकास की जिम्मेदारी हमने उनके कंधों पर ही रखी है ...ऐसे में आप उस आम आदमी को दोष कैसे देंगे जिसके हाथ में कुछ भी नहीं.............. जो इतना भोला है कि यदि एक ही बात उसे 2 बार बता दिया है तो वह उसे सच मान लेता है। जो महामारी मैं खुद चपेट में आया अपने परिवारों को खोया इसके बाद भी हिंदू मुस्लिम और हिंदुत्व की बातें कर रहा है।
      जब हमारा राजा ही निरंकुश और भावना शून्य होगा तो आप कैसे प्रजा से भावनाओं से भरपूर होने की बात कर सकते हैं वैसे भी पुरानी कहावत है  राजा के भाग्य को उसकी जनता भोगतीहै, अब वह अच्छा हो या बुरा । 
 आम जनता को इस महामारी में ऐसा कुछ नहीं मिल पाया जिससे वह खुश हो और कहे...... हमारा राजा अमर रहे उसने हमें इस महामारी में अपने पूरे सहियोग, दूरदर्शिता से बचा लिया।
     सभी प्रश्नों का जवाब उन मासूम और सुनी आंखों से पूछिए इसके विवाह को अभी एक वर्ष हुआ था और उसका पति आज उसके पास नहीं है, उस 60 साल की वृद्ध महिला से पूछे जिसमें जीवन है अपने पतिऔर बेटे का सहारा था  और आज वह सब नहीं है.. उस अबोध एक माह के बालक से पूछिए जिसने अपने पिता को पहचाना भी नहीं था और आज उसके पिता नहीं है....... और यह सब अभाव सिर्फ इसलिए हुआ कि जनता की परिवार के संरक्षण की मंशा में कमी नहीं थी सरकारों की सुविधाओं में कमी थी।
       आज यदि हजारों लाशें नदियों में बाहर जा रहे हैं तो यह भी एक कड़वा सच है अपोजिशन वाले ने वोट लेने के लिए यह लाशे नहीं बहा दी। ना तो इन लाशों की करोना की जांच हुई है और ना ही इन्हें कोई इलाज मिला है इसीलिए यह सब छुआछूत के इस महामारी में  ना तो श्मशान घाट में जगह पा रहे हैं और ना ही इन्हे पड़ोसियों का कंधा का करना ही नसीब हुआ।       
              हम सब ने साइकिल में अपनी पत्नी की लाश ले जाने वाली तस्वीर सोशल मीडिया में देखी ही है अब आप ही सोचिए इस तरह की अमानवीय के बीच यदि लाशें नदियों में उफना रही हैं तो क्या फर्क पड़ता है क्योंकि इन लाशों को पूछने वाला ना तो सरकारी तंत्र में कोई है और ना ही इनके समाज और परिवार में............. फिर अभी तो खुलकर बरसात भी नहीं आई।
      जिनके घर में कुछ खोया है शायद खोने की कीमत हमसे ज्यादा वह ही समझ सकते हैं, और हम सिर्फ उतना ही समझ सकते हैं जो अवस्थाएं हमने देखी........ क्योंकि हम से भी किसी ने मदद मांगी और हम लाख कोशिश करने के बावजूद ना तो ऑक्सीजन उपलब्ध करा पाए ना ही किसी अस्पताल में एक अदना सा बेड और इलाज के अभाव में हमने उस मदद मांगने वाले को खो दिया । 
         आज हमने उन्हें खो दिया, सबसे अफसोस जनक बात यह है कि मीडिया भी निष्पक्ष नहीं है या कहीं इतनी बंदिशों में बंधी हुई है इतनी बिकी हुई है कि सच कहने और दिखाने की ताकत खत्म हो गई ।
    हमारे लखनऊ में ही कोविड के नाम पर पिछली महामारी में भी और इस महामारी में भी कई टेंपरेरी हॉस्पिटल बनाए गए करोड़ों रुपए खर्च किए गए लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आता कि इस तरह के अस्पताल परमानेंट क्यों नहीं बना जाते ........यहां मेडिकल स्टाफ परमानेंट क्यों नहीं भर्ती किया जाता और ससमय दवा और अन्य सुविधाओं का टेंडर क्यों नहीं निकाला जाता है। क्यों हम महामारी की अगली लहर आने और हजारों के मर जाने का इंतजार करते हैं। यहां भी हम का मतलब मैं या कोई और नहीं हमारी सरकारें हैं जिन्हें हमने वोट देकर सत्ता सौंपी है।
    वाकई किसी देश काल में यदि आम आदमी स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने के कारण मर रहा है तो यह विफलता और अदूरदर्शिता उस सरकार की है जो शासन और सत्ता पर काबिज है।
   इसलिए भगवान से प्रार्थना करें और यह अनुरोध भी कि हमारे कर्मों की सजा देना अब बंद करें। मानव के अंदर मानवता बनी रहे इतना मौका हर मानव को दिया जाए ताकि वह अपनी गलतियों से कुछ सीख सके। फिर वह बात खुद के विश्लेषण की हो या सरकारों की...............
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@रीना

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